पत्रकारिता के लिये अपनी जान गंवा देने वाले आइंस्टीन सिंह चौधरी की पचीसवीं पुण्य तिथि आने वाली थी. वरिष्ठ एवं सक्रिय पत्रकारों में उनकी पुण्यतिथि को धूमधाम से मनाये जाने को लेकर बेहद गहमागहमी थी. वरिष्ठ पत्रकार बेकरार अली उनके सबसे खास शार्गिद रह चुके थे. वे उन्हें अपना गुरु मानते थे. आइंस्टीन जब जिंदा थे, तब शाम को उनको दारू-मुर्गा पहुंचाने का काम बेकरार अली के पास ही था. वह समय के इतने पाबंद थे कि आठ बजने से पांच मिनट पहले ही बेकरार अली दारू और चखना लेकर तय स्थान पर पहुंच जाते थे. आइंस्टीन भी बेकरार अली को बहुत मानते थे. बेकरार अली कबाड़ खरीदने और बेचने का काम करते थे, और एक बार किसी दो नंबर के काम में फंसे तो किसी दलाल के माध्यम से उनका संपर्क आइंस्टीन सिंह चौधरी से हुआ. चौधरी साहब अपने संपर्कों का इस्तेमाल करते हुए बेकरार अली को बचा लिया था. बस उसके बाद से ही बेकरार अली आइंस्टीन के हुए तो फिर हुए ही रह गये. और बेकरार कब पत्रकार बन गये उन्हें पता ही नहीं चला.
आइंस्टीन भी पत्रकारिता में आने से पहले सेकेंड हैंड गाड़ी बेचने और खरीदने का काम करते थे. पत्रकारिता उनका मूल पेशा नहीं था. वह भी अपनी जवानी के दौर में पत्रकार डेनियल कुमार भट्ट को दारू और चखना पहुंचाने का काम करते थे. फिर एक दिन उन्हें लगा कि उन्हें भी पत्रकार बनना चाहिये. उन्होंने एक साप्ताहिक अखबार खरीदा और सीधे संपादक बन गये. संपादक बनते ही उनकी धाक जमने लगी. आइंस्टीन सिंह चौधरी की सबसे बड़ी खूबी थी कि वह खबर खुद नहीं लिखते थे. उन्हें इसमें बेइज्जती महसूस होती थी. उन्होंने ताउम्र अपनी इज्जत से समझौता नहीं किया तो नहीं किया. किसी माई के लाल में दम नहीं था कि आइंस्टीन से एक खबर लिखवा सके, क्योंकि यह काम उनकी शान के खिलाफ था. आइंस्टीन मुंहजुबानी बहुत बड़े पत्रकार थे. वह अपनी सारी पत्रकारिता मुंह की बदौलत ही करते थे. खबर भले ही कोई दूसरा लिखता था, लेकिन आईएएस अधिकारियों में उनकी अलग धाक रहती थी. वह जिस अधिकारी को चाहते चादर ओढ़ाकर सम्मानित कर देते थे.
किसी का भी सम्मान किसी भी समय कर देने की वजह से आइंस्टीन को सम्मानित पत्रकार माना जाता था. बेकरार अली भी अपनी ताउम्र अपने गुरू आइंस्टीन सिंह चौधरी के बताये हुए मार्ग पर चलकर ही पत्रकारिता में अपने झंडे गाड़ रहे थे. पत्रकारिता करने के साथ वह पार्ट टाइम में एलईडी चलाने, होर्डिंग लगाने का काम करते थे. पत्रकारिता उनके लिये पैशन था, वह पत्रकारिता एवं पत्रकारों की भलाई के लिये जान दे सकते थे. इसी वजह से बेकरार अली ने कभी भी अपने पैशन से समझौता ना करते हुए गुरूजी की तरह सारी उम्र एक भी खबर नहीं लिखी. खबर लिखकर वह अपने आइंस्टीन गुरूजी का अपमान नहीं करना चाहते थे. इन्हीं पत्रकारिता के पितामह आइंस्टीन सिंह चौधरी जी की पचीसवीं पुण्यतिथि मनाई जानी थी. तय हुआ कि निदेशालय में गुरुजी की पुण्यतिथि मनाई जायेगी और मुख्य अतिथि किसी मंत्री को बनाया जायेगा, क्योंकि किसी पत्रकार के कार्यक्रम में किसी पत्रकार को मुख्य अतिथि बनाकर पत्रकारिता का कभी भला नहीं किया जा सकता है.
तो तय किया गया कि आइंस्टीन सिंह चौधरी के पुण्यतिथि पर चिकित्सा मंत्री बरजोर सिंह को मुख्य अतिथि बनाया जायेगा. बरजोर सिंह बेहद मिलनसार आदमी थे, हालांकि उनका सार ठीक आदमी नहीं था, फिर भी वह सबसे मिलते जुलते रहते थे. मंत्री जी बेहद सुलभ आदमी थे, लेकिन उनके सार ने सुलभ शौचालय पर ही कब्जा कर रखा था, फिर भी वह उद्घाटन, लोकार्पण, बरही, तेरही, छठी, सोहर, कजरी, छठ, दीवाली, तीज, करवा चौथ, ज्यूतिया जैसे कार्यक्रम आयोजन में पहुंचते रहते थे. उन्हें कई क्षेत्र की जनता मानती थी, इसलिये वह क्षेत्र बदल बदलकर चुनाव लड़ते थे और जीतते भी थे. वह बेहद लोकप्रिय आदमी थे, अपने सार से भी ज्यादा. खैर, जब उन्हें इस बात की जानकारी दी गई कि उन्हें पत्रकारिता के पितामह और कलम से लिखकर कभी अपने हाथ गंदे ना करने वाले आइंस्टीन सिंह चौधरी की पुण्यतिथि में मुख्य अतिथि बनकर चलना होगा, तो वह सहर्ष तैयार हो गये. साथ ही उन्होंने आइंस्टीन के योगदान की भी मौके पर ही सराहना की.
तय समय पर पुण्यतिथि का कार्यक्रम शुरू हुआ. आयोजन में होने वाले सारे कांड किये गये. शॉल से लेकर माला तक, जीजा से लेकर साला तक, सब कार्यक्रम हुआ. आइंस्टीन सिंह को याद करते हुए बरजोर सिंह मंत्री जी ने कहा कि आइंस्टीन से हमारा पुराना नाता था. मैंने अपनी पहली सेकेंड हैंड गाड़ी आइंस्टीन से ही खरीदी थी. ससुरे ने ठग लिया था, फिर भी हमारी दोस्ती थी. उनके गुरू डेनियल कुमार भट्ट ने मेरा परिचय आइंस्टीन से कराया था. खरीद-फरोख्त के काम के बाद जब आइंस्टीन पत्रकारिता में आये तो उन्होंने अपना झंडा गाड़ दिया. सबका सम्मान करना उनका शौक था. वह शॉल और माला साथ लेकर साथ चलते थे, जो जंच गया उसके हो गये आइंस्टीन. उन्होंने खबर लिखकर कभी किसी को ब्लैकमेल नहीं किया. ब्लैकमेल के आरोप से बचने के लिये ही उन्होंने अपनी सारी उम्र खबर नहीं लिखी. ऐसा काम कोई बिरले पत्रकार ही कर पाता है. आज बेकरार अली जैसे एकाध पत्रकार ही होंगे, जो बिना खबर लिखे ही पत्रकारिता की सेवा कर रहे हैं.
बरजोर ने भावुक होते हुए कहा, ‘’आज माइक कैमरा लेकर चलने वाला, दो चार शब्द यहां वहां लिख देने वाला अपने को पत्रकार समझने लगता है, जबकि आइंस्टीन और बेकरार अली, मनोहर शेख, जबर कसाना, इत्मतियाज मिश्रा, राबर्ट सिंह जैसे कुछ गिने चुने पत्रकार ही रह गये हैं, जो खबर ना लिखकर पत्रकारिता को बचाने का पवित्र काम कर रहे हैं. यह लोग पार्ट टाइम में भले ही दूसरे धंधे करते हों, लेकिन इनका असली पैशन पत्रकारिता ही है. सामने बैठे हुए दुबे जी को देखिये, ट्रक ओनर हैं, लेकिन पत्रकारों के सहयोग से ट्रक छुड़वाते छुड़वाते आज खुद ही मान्यता प्राप्त पत्रकार बन गये हैं. अब इनके जैसे लोग जो सेवा पत्रकारिता की कर देंगे, वैसी सेवा माइक कैमरा लेकर चलने वाले या दो चार शब्द लिखने वाले कभी नहीं कर सकते हैं. आज इन जैसे युवा पत्रकारों की ही समाज को दरकार है, जो बिना कुछ लिखे पढ़े देश और पत्रकारिता की सेवा कर सके. बहुतों को यह आसान लगता होगा, लेकिन ऐसे लोग एक बार बिना लिखे-पढ़े पत्रकारिता करके देखें तो औकात समझ आ जायेगी.’’
हाल जोरदार तालियों से गड़गड़ा उठा. पीछे से एक नारे वाली आवाज उठी, जिसमें जोश और जुनून दोनों था, ‘’बरजोर सिंह जी अमर रहे, आइंस्टीन सिंह चौधरी जिंदाबाद. एक माइक दो कलम, खबर लिखकर ना मरेंगे हम. दो आईडी एक कैमरा, विज्ञापन पर हक है हमरा.’’ बेकरार अली ने अपने गुरू को याद करते हुए कहा, ‘’गुरूजी महानता की चलती फिरती मिसाल थे. चलते पैग में चखना कम होने पर भी गुरूजी ने कभी दोबारा चखना लाने नहीं भेजा, सिगरेट से ही पैग खत्म कर देते थे. आज मैं जो भी हूं, जैसा भी हूं बस आइंस्टीन गुरूजी की वजह से हूं. मैं समस्त पत्रकारों से कहना चाहता हूं कि लिखकर पत्रकारिता करना आसान है, किसी में औकात है तो बिना लिखे पत्रकारिता करके दिखाये, यह बच्चों का खेल नहीं होता है. उम्र गुजर जाती है, और लोग यह काम कर नहीं पाते हैं.’’ कार्यक्रम में बेकरार अली को पत्रकारिता में योगदान देने के लिये सइयां अवस्थी ने ‘पत्रकार शिरोमणि’ पुरस्कार के साथ अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया.

