भारत में आरक्षण की व्यवस्था को देखकर कभी-कभी मेरे मन में एक सवाल आता है कि सरकार ने कहीं सामाजिक न्याय के नाम पर डेयरी तो नहीं खोल रखी है। किसी को दूध-दही मिल रहा है, किसी को दूध-दही-घी और किसी-किसी के हिस्से में इनके साथ मलाई भी पहुंच रही है।
अब जब गरीब सामान्य वर्ग की बारी आती है तो उसके हाथ में एक गिलास छाछ पकड़ा दी जाती है और कहा जाता है—लो भाई, तुम्हारे लिए EWS है।
अब कोई यह न समझे कि मैं आरक्षण के खिलाफ हूं। मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि अगर EWS का आधार ही आर्थिक कमजोरी है तो फिर गरीब सामान्य वर्ग के बच्चे की उस आर्थिक कमजोरी को दूर करने के लिए बाकी व्यवस्थाओं जैसा पूरा सहारा क्यों नहीं दिया गया?
EWS में मिला क्या?
2019 में संविधान के 103वें संशोधन के बाद आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अधिकतम 10 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता खुला। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में इसे बरकरार भी रखा।
मैंने सोचा, चलो गरीब सामान्य वर्ग के लिए भी कुछ तो हुआ।
लेकिन थोड़ा और देखने पर लगा कि मामला कुछ ऐसा है जैसे शादी में बारात तो पूरी आई हो, लेकिन खाने की बारी में प्लेट देखकर पता चले कि किसी को पूरी थाली मिली और हमारे हिस्से में छाछ।
SC, ST और OBC के लिए आरक्षण के अलावा सरकार की कई योजनाएं हैं। छात्रवृत्ति है, छात्रावास हैं, उच्च शिक्षा के लिए सहायता है, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग की व्यवस्था है और कुछ योजनाओं में विदेश में पढ़ाई तक के लिए सहायता दी जाती है।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की योजनाओं में SC छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति और उच्च शिक्षा की टॉप क्लास योजना है। OBC, EBC और DNT के लिए भी प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक, उच्च शिक्षा और छात्रावास जैसी योजनाएं हैं।
ST छात्रों के लिए भी छात्रवृत्ति से लेकर एकलव्य आवासीय विद्यालय और उच्च शिक्षा तक अलग-अलग योजनाएं हैं।
अब गरीब सामान्य वर्ग का बच्चा पूछता है—“साहब, मेरे लिए?”
जवाब आता है—“EWS है न!”
वह पूछता है—“उसमें क्या मिलेगा?”
जवाब—“दस प्रतिशत आरक्षण।”
अब वह बेचारा आगे पूछता है कि पढ़ाई की फीस, किताब, हॉस्टल, प्रतियोगी परीक्षा की फीस और कोचिंग का क्या होगा?
तो जवाब आता है—“उसके लिए सामान्य योजनाएं हैं, देख लो।”
मैं सोचता हूं, ये तो वही बात हो गई कि किसी को पूरी थाली परोसकर दी जाए और किसी को सिर्फ छाछ का गिलास
गरीब है, लेकिन गरीबी सिर्फ प्रमाणपत्र में है
एक बात मेरी समझ में नहीं आती।
गरीब बच्चे की गरीबी जाति देखकर थोड़े आती है।
स्कूल की फीस जाति पूछकर नहीं लगती।
किताब वाला यह नहीं पूछता कि बेटा किस वर्ग से हो, तभी किताब के पैसे लेगा।
कोचिंग वाला भी यह नहीं कहता कि आप EWS हैं तो फीस आधी कर दी जाएगी।
हॉस्टल वाला भी जाति देखकर किराया कम नहीं करता।
फिर अगर EWS आर्थिक कमजोरी के आधार पर बनाया गया है तो उस आर्थिक कमजोरी से लड़ने के लिए उसी हिसाब से सहायता क्यों नहीं बनाई गई?
सिर्फ आरक्षण देकर यह मान लेना कि गरीब की समस्या हल हो गई, मुझे कुछ वैसा ही लगता है जैसे किसी को डॉक्टर के पास ले जाकर सिर्फ पर्चा पकड़ा दिया जाए और कहा जाए—इलाज की व्यवस्था आप खुद कर लेना।
दूध, दही, घी और मलाई का हिसाब
मैंने जब इस विषय में थोड़ा और देखा तो लगा कि मामला सिर्फ आरक्षण का नहीं है।
कहीं शिक्षा में आरक्षण है।
कहीं सरकारी नौकरी में आरक्षण है।
फिर कुछ वर्गों के लिए नौकरी में पदोन्नति के स्तर पर भी आरक्षण की व्यवस्था है।
इसके अलावा छात्रवृत्ति, छात्रावास, कोचिंग, फेलोशिप और दूसरी आर्थिक सहायता वाली योजनाएं हैं।
मैं यह नहीं कह रहा कि ये योजनाएं गलत हैं। जिनको जरूरत है, उनको सहायता मिलनी चाहिए।
लेकिन मेरा सवाल गरीब सामान्य वर्ग के उस बच्चे से है जिसे सरकार ने खुद आर्थिक रूप से कमजोर मानकर EWS का प्रमाणपत्र दिया है।
जब सरकार मान रही है कि बच्चा आर्थिक रूप से कमजोर है तो उसकी आर्थिक कमजोरी सिर्फ आरक्षण वाली सीट पर ही क्यों दिखाई देती है?
फीस भरते समय क्यों नहीं?
कोचिंग लेते समय क्यों नहीं?
हॉस्टल लेते समय क्यों नहीं?
किताब खरीदते समय क्यों नहीं?
यानी गरीबी प्रमाणपत्र में है और खर्च बाजार के भाव से हो रहा है।
EWS की छाछ थोड़ी गाढ़ी कर दीजिए
EWS को दस प्रतिशत आरक्षण मिला, यह कोई छोटी बात नहीं है। लेकिन आरक्षण तो उस समय काम आएगा जब गरीब बच्चा पढ़-लिखकर उस परीक्षा या उस अवसर तक पहुंचेगा।
अगर उसके पास पढ़ने के पैसे ही नहीं हैं तो दस प्रतिशत सीट देखकर वह क्या करेगा?
गरीब बच्चा सिर्फ EWS का प्रमाणपत्र लेकर परीक्षा देने नहीं जाएगा।
उसे किताब भी चाहिए।
फीस भी भरनी है।
कोचिंग भी करनी है।
शहर से बाहर पढ़ना है तो हॉस्टल भी चाहिए।
और आखिर में परीक्षा भी देनी है।
इसलिए मेरा सवाल आरक्षण देने से नहीं है।
मेरा सवाल यह है कि EWS को सिर्फ आरक्षण तक क्यों सीमित रखा गया?
अगर आर्थिक कमजोरी आधार है तो आर्थिक सहायता भी उसी आधार पर क्यों नहीं?
दूसरों की थाली से दूध, दही, घी और मलाई छीनने की बात नहीं है।
बस इतना है कि जिस गरीब सामान्य वर्ग के बच्चे के लिए छाछ का गिलास रखा गया है, उसमें छाछ थोड़ी गाढ़ी तो कर दीजिए।
क्योंकि गरीब को यह कह देना कि “तुम्हारे लिए भी EWS है”, उसकी गरीबी का इलाज नहीं है।
और आखिर में मेरे मन में एक सवाल फिर आता है—
अगर EWS आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए है तो फिर उनकी गरीबी सिर्फ आरक्षण की सीट पर ही क्यों दिखाई देती है?
उनकी फीस, किताब, कोचिंग, हॉस्टल और पढ़ाई के खर्च में क्यों नहीं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि सामाजिक न्याय की इस डेयरी में दूध, दही, घी और मलाई का हिसाब तो बहुत पहले तय हो गया था…
गरीब सामान्य वर्ग के हिस्से में बस छाछ लिख दी गई।
Om Tiwari
इंडियन मॉरलिस्ट एक स्वतंत्र विचारधारा है, जहाँ समाज, राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर बेबाक और तार्किक विचार प्रस्तुत किए जाते हैं। उद्देश्य है—सवाल उठाना, तथ्यों को समझना और पाठकों को अपनी सोच बनाने के लिए प्रेरित करना।

