बुध, 09 सितम्बर 2026 | 05:16 पूर्वाह्न
Advertisement
18.08.2026 · Om Tiwari

भूत बाधा से ग्रस्त भारतीय राजनीति

bhoot-badha

भूत बाधा से त्रस्त भारतीय राजनीति

यहाँ भूत का तात्पर्य उस भूत से नहीं है जो आधी रात को सफेद चादर ओढ़कर पेड़ पर लटकता दिखाई देता है। यहाँ भूत का मतलब है—जो बीत गया।

वह घटना हो सकती है, समय हो सकता है, व्यक्ति हो सकता है, स्थान हो सकता है, पद और प्रतिष्ठा हो सकती है या फिर भूतकाल में लिया गया कोई राजनीतिक निर्णय।

आज भारतीय राजनीति को देखकर लगता है कि वह किसी न किसी भूत बाधा से जरूर ग्रस्त है। अंतर बस इतना है कि आम आदमी भूत भगाने के लिए नींबू-मिर्च और झाड़-फूंक का सहारा लेता है और राजनीति में भूत भगाने के लिए भाषण, चुनावी मंच और प्रेस कॉन्फ्रेंस पर्याप्त माने जाते हैं।

इस विषय पर कुछ लिखने से पहले मैंने सोचा कि पाठकों को यह स्पष्ट कर दूँ कि यह कोई भूत-प्रेत वाली कहानी नहीं है।

मेरे एक गुजराती मित्र ने कभी मुझसे कहा था—

“जो बीते समय की बात करता है, उसका आज खराब चल रहा है और जो आने वाले कल की ज्यादा बात करता है, उसकी नीयत खराब है।”

मुझे उनकी बात तब भी दिलचस्प लगी थी और आज भारतीय राजनीति को देखकर वह और भी ज्यादा प्रासंगिक लगती है।

अंग्रेज चले गए, लेकिन भूत नहीं गया

आजादी के बाद जब सत्ता कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरू के हाथों में आई तो देश की हालत वास्तव में आसान नहीं थी। देश गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी से जूझ रहा था। औपनिवेशिक शासन से निकले भारत के सामने राष्ट्र निर्माण की बहुत बड़ी चुनौती थी।

उस समय जनता से कहा गया—थोड़ा समय दीजिए, हम एक मजबूत और समृद्ध भारत बनाएंगे।

यह बात स्वाभाविक भी थी।

लेकिन राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि समय बीत जाता है, भाषण नहीं बीतते।

अंग्रेज चले गए, लेकिन राजनीति के भाषणों में अंग्रेज लंबे समय तक जीवित रहे।

कभी कहा गया कि अंग्रेजों ने देश को लूट लिया।

कभी कहा गया कि उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था बर्बाद कर दी।

कभी कहा गया कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं।

फिर 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। देश ने अपने संवैधानिक गणराज्य की नई यात्रा शुरू की। संविधान के अनुच्छेद 394 के अनुसार इसके अधिकांश प्रावधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुए।

तब उम्मीद थी कि अब अपना संविधान है, अपनी सरकार है, अपने कानून हैं और अब देश अपनी दिशा खुद तय करेगा।

लेकिन सवाल यह है कि अगर हर समस्या की जिम्मेदारी पिछली व्यवस्था की ही रहनी है तो फिर सत्ता में आने का मतलब क्या है?

नेहरू के भूत कौन थे?

जवाहरलाल नेहरू लंबे समय तक देश के प्रधानमंत्री रहे।

उनके सामने चुनौतियाँ कम नहीं थीं। देश को संस्थाएँ बनानी थीं, अर्थव्यवस्था खड़ी करनी थी, शिक्षा और उद्योग का विस्तार करना था और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को जड़ें जमानी थीं।

लेकिन आलोचना का प्रश्न यह है कि जब सत्ता आपके पास वर्षों तक रहती है तो फिर हर समस्या का कारण केवल अतीत को कितने समय तक बताया जा सकता है?

एक समय अंग्रेज जिम्मेदार थे।

फिर चीन युद्ध एक बड़ा संदर्भ बना।

फिर पाकिस्तान।

फिर संसाधनों की कमी।

फिर गरीबी।

फिर प्रशासनिक समस्याएँ।

इन सबके अपने-अपने ऐतिहासिक कारण थे और उन्हें नकारा नहीं जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में एक बिंदु ऐसा जरूर आता है जब जनता पूछती है-

ठीक है, समस्या हमें बता दी। अब समाधान कौन देगा?

यही वह जगह है जहाँ राजनीति और इतिहास की किताब के बीच अंतर पैदा होता है।

इतिहास अतीत को समझाता है।

राजनीति को वर्तमान को बदलना होता है।

मोदी जी की भूत बाधा का नाम—कांग्रेस

अब आइए वर्तमान पर।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की राजनीति में सबसे बड़ा राजनीतिक भूत कौन है?

कांग्रेस।

कांग्रेस सत्ता में हो या विपक्ष में, भारतीय राजनीति में उसका नाम आज भी बार-बार लिया जाता है।

“कांग्रेस ने 70 साल में क्या किया?”

यह सवाल भारतीय राजनीति के सबसे ज्यादा दोहराए जाने वाले सवालों में से एक बन चुका है।

समस्या यह नहीं है कि कांग्रेस के शासनकाल की आलोचना क्यों की जाती है।

आलोचना होनी चाहिए।

सत्तर साल के शासन का हिसाब भी होना चाहिए।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब सत्ता में रहने के वर्षों की संख्या बढ़ती जाती है और भूतकाल की उम्र भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है।

कल तक कांग्रेस के 70 साल थे।

फिर किसी दिन शायद हिसाब लगाकर बताया जाएगा कि कांग्रेस ने 75 साल देश को लूटा।

फिर 80 साल।

फिर 90 साल।

एक दिन ऐसा भी हो सकता है कि देश में कोई बच्चा पैदा हो और उसके जन्म प्रमाणपत्र पर लिख दिया जाए—

“इस बच्चे की समस्या के लिए कांग्रेस के पिछले 100 वर्ष जिम्मेदार हैं।”

व्यंग्य है, लेकिन सवाल गंभीर है।

अगर कांग्रेस दोषी है तो व्यवस्था किसकी जिम्मेदारी है?

मान लीजिए कि कांग्रेस के शासनकाल में भ्रष्टाचार था।

मान लीजिए कि प्रशासनिक व्यवस्था में खामियाँ थीं।

मान लीजिए कि नीतियों में गलतियाँ हुईं।

मान लीजिए कि देश को जितनी गति से आगे बढ़ना चाहिए था, उतनी गति से नहीं बढ़ा।

तो फिर सवाल यह है कि पिछले एक दशक से अधिक समय से सत्ता में बैठी सरकार की जिम्मेदारी कहाँ से शुरू होती है?

क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता के साथ सिर्फ प्रधानमंत्री आवास नहीं मिलता, जवाबदेही भी मिलती है।

अगर अफसरशाही आज भी परेशान कर रही है तो उसे ठीक करना किसकी जिम्मेदारी है?

अगर सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार है तो उसे रोकना किसकी जिम्मेदारी है?

अगर जातिवाद आज भी राजनीति का हथियार है तो उसे खत्म करने की जिम्मेदारी किसकी है?

अगर क्षेत्रवाद अभी भी चुनावी समीकरणों का हिस्सा है तो इसका समाधान कौन करेगा?

और अगर देश में आज भी गरीब व्यक्ति अपने बच्चों की शिक्षा, इलाज और रोजगार को लेकर परेशान है तो उसे हर बार यह बताना कि “पहले की सरकारों ने क्या किया था”, आखिर कब तक चलेगा?

देश बदला है, लेकिन राजनीति का बहाना नहीं

यह भी सच है कि भारत ने पिछले दशकों में बहुत प्रगति की है।

आर्थिक विकास, डिजिटल तकनीक, आधारभूत ढाँचा, अंतरिक्ष, डिजिटल भुगतान और कई दूसरे क्षेत्रों में भारत ने महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं।

गरीबी के मोर्चे पर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। नीति आयोग के अनुसार भारत में बहुआयामी गरीबी 2015-16 के 24.8 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 14.96 प्रतिशत हुई और 2022-23 के लिए इसके 11.28 प्रतिशत तक आने का अनुमान दिया गया है।

लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं कि समस्याएँ समाप्त हो गईं।

देश आगे बढ़ा है तो यह उपलब्धि है।

लेकिन अगर किसी गरीब के लिए आज भी जीवन संघर्ष है तो उस संघर्ष को सिर्फ आंकड़ों से समाप्त नहीं किया जा सकता।

यही बात राजनीति पर भी लागू होती है।

देश बदल गया, तकनीक बदल गई, अर्थव्यवस्था बदल गई, लेकिन राजनीतिक बहानों की शब्दावली बहुत ज्यादा नहीं बदली।

राजनीति सेवा से सत्ता और सत्ता से व्यापार तक?

भारतीय राजनीति कभी सेवा का माध्यम मानी जाती थी।

कम से कम सार्वजनिक रूप से तो यही कहा जाता था।

अब स्थिति कुछ अलग दिखाई देती है।

आज राजनीति में टिकट चाहिए, चुनाव लड़ना है, प्रचार करना है, संसाधन चाहिए, समर्थक चाहिए, संगठन चाहिए और चुनाव जीतने के बाद सत्ता के समीकरण संभालने हैं।

फिर कभी-कभी ऐसा दृश्य भी दिखाई देता है कि जिस विधायक को जनता ने एक पार्टी के टिकट पर चुना था, वह कुछ समय बाद दूसरी पार्टी की सरकार में दिखाई देता है।

जनता सोचती रह जाती है

हमने विधायक चुना था या शेयर बाजार का ऐसा शेयर खरीदा था जिसका मालिक कभी भी बदल सकता है?

भारतीय निर्वाचन आयोग खुद चुनावी पारदर्शिता, राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च और उम्मीदवारों की जानकारी सार्वजनिक करने की व्यवस्था रखता है। उम्मीदवारों के हलफनामे भी सार्वजनिक किए जाते हैं, जिनमें संपत्ति और आपराधिक मामलों जैसी जानकारियाँ शामिल होती हैं।

यानी व्यवस्था ने पारदर्शिता के लिए दरवाजे तो बनाए हैं।

अब सवाल यह है कि क्या राजनीति ने उन दरवाजों से पारदर्शिता को अंदर आने दिया है?

Om Tiwari
Guest Author

Om Tiwari

Share this article