गाँधी जी के तीन बंदर—बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो।
इस शीर्षक का मेरा आशय गाँधी जी के बारे में चर्चा करना नहीं है। मैं तो यह जानने को उत्सुक हूँ कि क्या ये तीनों बातें वास्तव में देश, जनता और समाज के लिए उपयुक्त हैं या फिर इनका इस्तेमाल कुछ पावरफुल राजनेताओं, व्यापारियों और अधिकारियों के कुकर्मों को अनदेखा करने के लिए किया जाता है।
गाँधी जी के तीन बंदरों में पहला है—बुरा मत देखो।
पहला बंदर — बुरा मत देखो
यह कथन आज के समय का तो है नहीं। जिस समय यह बात कही गई होगी, उस समय आज जैसी रील्स और वेब सीरीज वाली अश्लीलता भी नहीं थी। उस लिहाज से देखें तो बुरा मत देखो एक अच्छी सीख हो सकती है।
लेकिन आज पहला बंदर मुझे कुछ ज्यादा ही सफल दिखाई देता है।
एक गरीब को बीच सड़क पर मारा जा रहा है—कोई नहीं देख रहा।
महिला के साथ अत्याचार हो रहा है—कोई नहीं देख रहा।
आंखों के सामने भ्रष्टाचार हो रहा है—कोई नहीं देख रहा।
सरकारी जमीन पर कब्जा हो रहा है—कोई नहीं देख रहा।
और सबसे मजेदार बात यह है कि कई लोग देख भी रहे हैं, लेकिन देखकर भी ऐसे अनदेखा कर रहे हैं जैसे देखा ही नहीं।
देखकर भी अनदेखा करना भी एक तरह से न देखना ही है।
इसलिए लगता है कि गाँधी जी का पहला बंदर आज पेड़ पर नहीं, हम सबके अंदर बैठा है।
दूसरा बंदर — बुरा मत सुनो
अब दूसरे बंदर की बात।
जनता चिल्ला रही है कि उसके साथ गलत हो रहा है।
सड़क खराब है।
सरकारी कार्यालय में भ्रष्टाचार है।
अधिकारी काम नहीं कर रहा।
किसी की पेंशन रुकी है।
किसी का राशन नहीं मिल रहा।
कहीं सरकारी कर्मचारी जनता को परेशान कर रहा है।
लेकिन अधिकारी साहब के कान में तेल पड़ा हुआ है।
नेता सुनना नहीं चाहते।
सरकार अपनी सुविधा की बात सुनती है।
और जनता अपनी समस्या लेकर घूमती रहती है।
न्यायालय तक वही आवाज ज्यादा आसानी से पहुंचती है जिसके पास अपनी आवाज पहुंचाने का साधन है।
तो फिर सवाल यह है कि “बुरा मत सुनो” की सीख आखिर किसके लिए है?
जनता के लिए?
या साहब लोगों के लिए?
क्योंकि जनता तो अपनी समस्या सुनाने के लिए तैयार बैठी है, बस कोई सुनने वाला चाहिए।
तीसरा बंदर — बुरा मत कहो
अब तीसरा बंदर।
यह सीख भी जनता के लिए ही बताई जाती है।
लेकिन जनता है कि मानती ही नहीं। बुरा कहती रहती है, शिकायत करती रहती है और नेताओं को गालियां भी देती है।
शायद जनता ने नेताओं से यह नहीं सीखा कि अच्छी बातों का चूरन कैसे बेचा जाता है।
लेकिन सरकारी नौकरी मिलते ही आदमी के अंदर यह तीसरा बंदर जरूर जाग जाता है।
जनता को—“चुप रहिए।”
साहब के सामने—“जी साहब, बिल्कुल साहब।”
जनता को नियम समझाओ।
साहब के लिए नियम की व्याख्या बदल दो।
जनता आवाज उठाए तो बदतमीज।
साहब गलत करें तो “मामला देख रहे हैं।”
यह कौन सा बुरा मत कहो है भाई?
ये बंदर आए कहाँ से?
एक मजेदार बात यह भी है कि इन तीन बंदरों को पूरी तरह गाँधी जी की खोज मानना भी सही नहीं है।
जापान के निक्को स्थित तोशोगू मंदिर में 17वीं शताब्दी की प्रसिद्ध तीन बंदरों की नक्काशी मौजूद है—मिज़ारू, किकाज़ारू और इवाज़ारू।
यानी इसे पूरी तरह चीनी माल भी नहीं कह सकते।
वरना हम तो तुरंत कह देते—
“चीनी माल है, इसलिए ठीक से काम नहीं कर रहा।”
गाँधी जी के पास भी तीन बंदरों की प्रतिमा थी और उन्होंने इसके संदेश का उल्लेख किया था। इसलिए भारत में यह तीन बंदर गाँधी जी के साथ इस तरह जुड़ गए कि अब दोनों को अलग करना मुश्किल है।
अब तीन बंदरों की जरूरत किसे है?
मेरे हिसाब से आज इन तीन बंदरों की थोड़ी मरम्मत करने की जरूरत है।
पहला बंदर कहे—
बुरा मत देखो नहीं, बुरा होते देखो।
दूसरा कहे—
बुरा मत सुनो नहीं, जनता की सुनो।
और तीसरा कहे—
बुरा मत कहो नहीं, बुराई के खिलाफ बोलो।
क्योंकि अगर किसी गरीब के साथ अन्याय हो रहा है तो आंख बंद करना गांधीवाद नहीं हो सकता।
अगर जनता परेशान है तो कान बंद करना समाधान नहीं हो सकता।
और अगर सत्ता गलत कर रही है तो उसके खिलाफ बोलना भी कोई अपराध नहीं होना चाहिए।
आखिर में बस इतना ही कहूँगा—
गाँधी जी के तीन बंदर शायद उस समय इंसान को बुराई से बचने की सीख देते होंगे।
लेकिन अगर आज इनका मतलब यह हो गया है कि—
बुरा मत देखो, ताकि साहब जो कर रहे हैं वह दिखाई न दे।
बुरा मत सुनो, ताकि जनता की आवाज सुनाई न दे।
बुरा मत कहो, ताकि साहब को बुरा न लगे।
तो फिर ये गाँधी जी के तीन बंदर नहीं हैं।
ये उस व्यवस्था के तीन बंदर हैं, जो चाहती है कि जनता की आंख, कान और मुंह तीनों बंद रहें।
और आखिर में बेचारे बंदरों का क्या दोष?
बंदर तो आंख, कान और मुंह बंद करके बैठे हैं।
सवाल तो उन लोगों से है जिन्होंने इन्हें जनता के अंदर घुसा दिया है।
और शायद इसी लिए कहना पड़ता है—
गाँधी जी के तीन बंदर घुस गए हैं सबके अंदर, या घुसा दिए गए हैं सबके अंदर?
भूत बाधा से ग्रस्त भारतीय राजनीति
Om Tiwari
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