लखनऊ मेट्रो के शुरू होने के कुछ महीनों बाद मैंने अपना मेट्रो कार्ड बनवाया। बनवाते समय लखनऊ मेट्रो ने मुझसे 100 रुपये बतौर कार्ड की जमानत के तौर पर लिए और यह वादा किया कि जिस दिन आप यह कार्ड सरेंडर करेंगे, उस दिन आपके ये 100 रुपये वापस कर दिए जाएंगे।
पिछले कुछ महीनों से मुझे मेट्रो में यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। आज दिनांक 23/08/2026 को जब मैं मुंशी पुलिया मेट्रो स्टेशन पर पहुंचा और कार्ड रिचार्ज करने के लिए टिकट खिड़की पर पहुंचा तो वहां बैठे व्यक्ति ने कहा—“यह कार्ड अब रिचार्ज नहीं होगा, मैं इसे सरेंडर कर दे रहा हूं। आप वहां”—इशारा करते हुए—“बैठे व्यक्ति से दूसरा कार्ड ले लें।”
मैंने सोचा, ठीक है। क्या पता धर्मपत्नी जी पैंट के साथ कार्ड भी धो दिया हो। कार्ड बेचारा शर्म से पानी-पानी हो गया हो और अब काम करने से इंकार कर रहा हो।

कार्ड बदलना है या पूरी कुंडली बतानी है?
जब मैं उस व्यक्ति के पास पहुंचा तो देखा कि ना तो उसके पास लखनऊ मेट्रो की कोई आईडी है ना मेट्रो का ड्रेस कोड। एयरटेल बैंक की टी-शर्ट पहने, पीछे एयरटेल बैंक का बैनर और दिखने में अल्फ़ा जेन जी किस्म का बंदा बैठा हुआ है। उसने अपना मोबाइल निकाला, एक ऐप स्टार्ट की और पहला सवाल दागा—
“अपना मोबाइल नंबर दीजिए।”
मैंने कहा, “भाई, कार्ड रिप्लेस करना है तो आपको मेरे मोबाइल नंबर की आवश्यकता क्यों है?”
वो बोला, “सर, हम एयरटेल बैंक से हैं और नए कार्ड के लिए आपको मोबाइल नंबर देना पड़ेगा।”
मैंने भी कहा, “नहीं देता। आप एक काम करो, कार्ड सरेंडर करके मेरे 100 रुपये, जो वादा किया था, वो वापस दे दो। मुझे इससे कोई मतलब नहीं है मुझे सिर्फ आपको नया कार्ड देना है। अगर नया कार्ड चाहिए तो डिटेल्स दीजिए, नहीं तो आप जाकर काउंटर पर बात करिए।”
मैं अपना मुंह उठाए काउंटर के पास पहुंच गया।
मैंने कहा, “भाई, वो मेरी पर्सनल डिटेल्स क्यों मांग रहा है?”
उन्होंने कहा, “मेट्रो ने एयरटेल बैंक के साथ कोई डील की है। अब आपका जो कार्ड बनेगा, वो ऑल ओवर इंडिया चलेगा।”
मैंने कहा, “भाई, मुझे नहीं चाहिए। आप एक काम करो, इसको पहले ही सरेंडर कर दिया है, अब मेरे 100 रुपये वापस कर दो और एक टिकट दे दो।”
जवाब आया—
“सर, इसकी परमिशन नहीं है।”
मेरी खोपड़ी घूमी कि फिर इस रशीद में क्यों लिखा कि कार्ड सरेंडर और पेमेंट कैश 100 रुपए दिए।
मैंने कहा, “ये क्या बवाल है? आपने कार्ड देते समय वादा किया था कि सरेंडर करने पर 100 रुपये वापस मिलेंगे। आज आप अपने ही वादे से मुकर रहे हैं?”
वो बोले, “आप दूसरी तरफ कस्टमर केयर पर जाकर बात करिए। मैं इससे ज्यादा मदद नहीं कर सकता।”

सवाल पूछने में क्या बुराई है?
मुझे भी थोड़ा रोमांच सा आने लगा।
मैंने सोचा, ZEN-G की तो मेरी उम्र अब है नहीं, लेकिन सवाल पूछने में क्या बुराई है?
अब मैं कस्टमर केयर के सामने खड़ा था और मेरे सवाल वही थे।
लखनऊ मेट्रो किसी के साथ डील करे, मुझे इससे क्या?
वहां बैठा बंदा मेरी पर्सनल डिटेल्स क्यों मांग रहा है?
जब मेरा पुराना कार्ड रिचार्ज नहीं हो सकता और उसे सरेंडर कर दिया गया है तो मेरी 100 रुपये की जमानत वापस क्यों नहीं की जा रही?
कस्टमर केयर वाले ने कहा—
“सर, आपकी बात सही है, लेकिन लखनऊ मेट्रो ने अभी सिर्फ कार्ड रिप्लेसमेंट की परमिशन दी है। मेरे पास अथॉरिटी नहीं है कि मैं कार्ड वापस लेकर आपको पैसे दे दूं।”
मैंने कहा, “देश का कानून तो पहले ही आंखों पर पट्टी बांधे बैठा है, फिर भी आप मुझे यही बात लिखकर दे दीजिए।”
“नहीं सर, मैं लिखकर नहीं दे सकता।”
मैंने पूछा, “क्यों भाई?”
फिर वही घिसा-पिटा जवाब—
“अथॉरिटी नहीं है।”
मैंने कहा, “जिसके पास है उसे बुलाओ। आप तो अपने वादे से मुकर रहे हो।”
जवाब फिर वही—
“सर, मेरे हाथ में कुछ नहीं है।”
फिर आए नए शूट-बूट वाले साहब
ज्यादा जोर देने पर एक नए शूट-बूट वाले साहब आए।
मैंने कहा, “सर, लखनऊ मेट्रो ने एयरटेल बैंक के साथ डील की है। इसमें मेरी क्या गलती है?”
बोले, “नहीं सर, आपकी कोई गलती नहीं है।”
मैंने फिर कहा, “फिर मेरे पैसे क्यों नहीं दे रहे हो?”
वो बोले, “सर, नया जिओ जो आया है उसमें सिर्फ रिप्लेसमेंट की ही पॉलिसी है।”
मैंने कहा, “तो आप रिप्लेस करके दे दो।”
उन्होंने कहा, “वो तो मैं नहीं कर सकता। वो एयरटेल बैंक वाला बंदा करेगा।”
मैंने कहा, “तो फिर मैं क्या करूं?”
शूट – बूट वाले साहेब बोले, सर मैं जनता हूँ, ये गलत है, “आप कम्प्लेन कर सकते हैं। हम उसे ऊपर तक पहुंचाएंगे।”
बस, इसी बहस में 30 से 40 मिनट की बलि चढ़ गई।
फिर याद आया कि मुझे अब देर हो रही है। आखिर जिस काम के लिए मेट्रो कार्ड बनवाया था, वो काम तो हुआ नहीं।
फिर अपना सा मुंह लेकर वापस टिकट खिड़की के पास पहुंचा, 40 रुपये कैश दिए और टिकट लेकर अपने गंतव्य की ओर चल निकला।
मेट्रो में बैठकर कुछ सवाल आए
मेट्रो में बैठे-बैठे मेरे मन में कुछ सवाल आए।
क्या अब मेट्रो जैसी संस्थाएं भी अपने फायदे के लिए लोगों का शोषण करेंगी?
कार्ड देते समय मुझसे किए गए वादे का कोई अस्तित्व ही नहीं था?
जब मैं पहले कार्ड लेते समय अपनी जानकारी दे चुका हूं तो मुझसे दोबारा मेरी पर्सनल डिटेल्स क्यों मांगी जा रही हैं?
मेरे पुराने कार्ड को सरेंडर करने से पहले मुझे नए कार्ड के नियम क्यों नहीं बताए गए?
अगर लखनऊ मेट्रो और किसी बैंक के बीच कोई नई डील हुई है तो उसका बोझ और उसकी शर्तें ग्राहक पर क्यों डाली जा रही हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—
जब कार्ड देते समय 100 रुपये जमानत के तौर पर लिए गए थे और सरेंडर करने पर वापस करने का वादा किया गया था, तो आज उस वादे का क्या हुआ?
क्या कोई संस्था अपनी सुविधा के हिसाब से अपने पुराने वादे और नियम बदल सकती है?
मुझे नहीं पता कि इस मामले में तकनीकी रूप से लखनऊ मेट्रो सही है या गलत। हो सकता है उनके पास अपनी तरफ से कोई नियम और मजबूरी हो।
लेकिन एक ग्राहक के तौर पर मेरा सवाल सीधा है—
अगर नियम बदल गया है तो ग्राहक को पहले बताया क्यों नहीं गया?
और अगर पुराना कार्ड बंद कर दिया गया है तो मेरे 100 रुपये का क्या हुआ?
आपको क्या लगता है?
क्या इस मामले में लखनऊ मेट्रो अपनी जगह सही है या यह ग्राहक के साथ दादागिरी है?
अपनी राय अवश्य दें।
भूत बाधा से ग्रस्त भारतीय राजनीति
Om Tiwari
इंडियन मॉरलिस्ट एक स्वतंत्र विचारधारा है, जहाँ समाज, राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर बेबाक और तार्किक विचार प्रस्तुत किए जाते हैं। उद्देश्य है—सवाल उठाना, तथ्यों को समझना और पाठकों को अपनी सोच बनाने के लिए प्रेरित करना।

