शरद सिंह
राजनीति में व्यंग्य कोई नई चीज नहीं है। नेताओं पर कटाक्ष हुए हैं, तंज कसे गए हैं, हास्य हुआ है और कई बार सदन में ऐसी टिप्पणियाँ भी हुई हैं जिन पर पूरा सदन हँसा है। लेकिन व्यंग्य और अपशब्द में एक बहुत महीन, मगर बेहद महत्वपूर्ण अंतर होता है। व्यंग्य किसी के विचार, निर्णय, नीति, राजनीतिक शैली या सार्वजनिक आचरण पर चोट करता है।
अपशब्द या अमर्यादित वाक्य सीधे व्यक्ति की गरिमा पर हमला करती है। व्यंग्य में बुद्धि चाहिए, भाषा चाहिए और बात को पलटकर कहने की कला चाहिए। अपशब्दों में इन सबकी जरूरत नहीं होती बस सामने वाले को नीचा दिखाने की इच्छा काफी है।
संसदीय इतिहास में इसका एक सुंदर उदाहरण मिलता है। अक्साई चिन पर चर्चा के दौरान जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि वहाँ पेड़ नहीं उगते। इस पर महावीर त्यागी ने अपने गंजे सिर की ओर संकेत करते हुए जवाब दिया कि मेरे सिर पर भी बाल नहीं उगते, तो क्या इसका मतलब यह है कि सिर का कोई महत्व नहीं?
सदन में हँसी हुई। यह व्यंग्य था। तर्क की कमजोरी पर चोट करने के लिए अपनी स्थिति को उदाहरण बनाना, न कि सामने वाले की व्यक्तिगत बेइज्जती करना लेकिन अब इसी कसौटी को अपने पसंदीदा नेताओं पर भी लगाना चाहिए। नरेंद्र मोदी की राजनीति के समर्थक होने के कारण यदि मैं राहुल गांधी की भाषा पर सवाल उठाता हूं, तो मुझे यह भी स्वीकार है कि मोदी की राजनीतिक भाषा में भी ऐसे उदाहरण रहे हैं, जिन्हें मर्यादित व्यंग्य की श्रेणी में रखना मुश्किल है।
फिर भी राहुल गांधी की किसी व्यक्तिगत टिप्पणी को गलत ही नहीं कहा जाए और मोदी के पुराने व्यक्तिगत कटाक्षों को इस भाषाई मर्यादा हनन को आधार बना हास्य, व्यंग्य, ह्यूमर की सीमा लांघ उनकी पत्नी उनकी माता उनके परिवार के लिए गालियाँ दिया जाए और सार्वजनिक मंच से एक राष्ट्रध्यक्ष को जोड़कर हल्की बातें कही जाए तो जिसे खुश होना हो, वो हो लेकिन मुझे इस विकृत मानसिकता पर तरस भी नहीं आता।
कसौटी व्यक्ति देखकर बदल जाएगी तो वह कसौटी नहीं, पक्षपात है और यही इस पूरे विवाद की असली बात है। इस सार्वजनिक बेहूदगी की शुरूआत कांग्रेसियों द्वार ही शुरू हुई। सोनिया गांधी का “मौत का सौदागर” कहना, मणिशंकर अय्यर का “नीच आदमी” कहना गलत की शुरुवात थी तो मोदी का “जर्सी गाय ” या “50 करोड़ की गर्लफ्रेंड” जैसे व्यक्तिगत संबोधन करना भी मर्यादित राजनीतिक व्यंग्य का आदर्श उदाहरण नहीं था।
गलत की शुरुआत किसने की, यह किसी गलत को सही नहीं बना देता। राजनीति में तीखा बोलना, कटाक्ष करना, तर्क की धज्जियाँ उड़ाना,किसी की नीति और राजनीतिक सोच पर जमकर हमला करना मर्यादित है। लेकिन व्यक्ति की गरिमा को निशाना बनाकर फिर उसे “व्यंग्य”, “ह्यूमर”, “राजनीतिक तेवर” या “कटाक्ष” बताना उचित नहीं।
क्योंकि व्यंग्य विचार को चोट करता है, अपशब्द और अमर्यादित एक्ट व्यक्ति को और लोकतंत्र में असली बहस वहीं से शुरू होती है जहाँ हम अपने विरोधी के लिए भी वही भाषा की कसौटी स्वीकार करते हैं, जो अपने नेता के लिए चाहते हैं। अपने नेता की गाली को व्यंग्य और विरोधी के व्यंग्य को गाली कहना, यह राजनीति हो सकती है, किसी अपने के प्रति सहृदयता हो सकती है, गंदगी में उतरने का उपक्रम हो सकता है लेकिन है ये मानसिक बीमारी ही।

