बुध, 09 सितम्बर 2026 | 05:01 पूर्वाह्न
Advertisement
14.08.2026 · Anil Singh

जहां भी अडानी समूह हाथ रखता है, वहां हाथ रखने से दूसरी कंपनियां डरती क्‍यों हैं?

गौतम अडानी जी का एक प्रवचन सुन रहा था, जिसमें वह कह रहे हैं कि जब मैं पहली बार मुंबई पहुंचा तो मैं सीखना चाहता था, काम को समझना चाहता था, लोगों को समझना चाहता था. मेरे प्रोजेक्ट साइट पर जो भी युवा आता है, उसमें मुझे अपना ही सफर दिखता है. खैर, अडानी जी को सुनकर अच्छा लगा, लेकिन लाखों लोग केवल साइट पर काम ही करते रह जाते हैं, क्योंकि उनको कोई ऐसा साथी नहीं मिलता है, जो उनको एयरपोर्ट, पोर्ट या सरकारी सम्पत्ति सस्ते दामों पर दिलवा सके.
अब देखिये… 1988 में अडानी जी ने अपना सफर शुरू किया था. तब से लेकर 2013 तक उनका कुल नेटवर्थ 5 अरब डॉलर के आसपास थी. यानी 25 सालों में अडानी जी केवल 5 अरब डॉलर तक ही पहुंच पाये थे. नियम कानून के साथ डंटे रहते तो 5 अरब डॉलर से 10 अरब डॉलर तक पहुंचने में कम से कम दस साल लग जाते, लेकिन 2014 में मोदीजी की सरकार बनने के बाद अडानी जी के बिजनेस ने ऐसा छलांग मारा कि दुनिया भौचक्क रह गई.
वर्तमान में उनके समूह का नेटवर्थ 85 से 90 अरब डॉलर के आसपास है. यह स्थिति तब है, जब उनका समूह किसी मैकेनिकल चीज का उत्पादन नहीं करता है. यानी अडानी समूह किसी उद्योग का संचालन नहीं करता है बल्कि वह दूसरों के संसाधन को अपना बनाकर बेचता है, मतलब केवल बिजनेस करता है. 2013 में अडानी जी भारत के टॉप टेन अमीर बिजनेसमैनों की लिस्ट में तक शामिल नहीं थे. विश्व में भी उनकी अमीरी का नंबर 609 था.
परंतु मोदीजी के केंद्र में पहुंचते ही अडानी साहब की किस्मत बदलने लगी, जबकि उनकी साइट पर आने वाले किसी भी दूसरे साथी को मोदीजी टाइप का कोई साथी ही नहीं मिला कि उसकी किस्मत बदल सके. पर, अडानी जी की किस्मत ऐसी बदली कि 2022 में वह 137.4 अरब डॉलर के साथ बर्नार्ड अरनॉल्ट को पीछे छोड़ते हुए विश्व के तीसरे नंबर के अमीर हो गये. वह एशिया से टॉप तीन में पहुंचने वाले पहले व्यापारी बने, जबकि खानदानी व्यापारी अंबानी पीछे रह गये.
वह तो बुरा हो हिडनबर्ग का, जिसने अडानी समूह के खेल का खुलासा करके उनका मार्केट डाऊन कर दिया. अन्यथा जिस रफ्तार से दूसरे समूहों पर सीबीआई और ईडी का छापा पड़ने के बाद उस समूह की शॉपिंग कर रहे थे, उस हिसाब से तो फिर इनकी अमीरी को कोई पकड़ ही नहीं पाता. बाजार से झटका खाने के बावजूद वर्तमान में अडानी परिवार अमीरी के मामले में 17 से लेकर 19 वें नंबर के बीच झूलता रहता है.
एक बार फिर भारत में उनसे ज्यादा अमीर अंबानी परिवार हो गया है. पर सवाल अक्सर ही उठते हैं कि ऐसा क्या है कि मोदी की सरकार आने के बाद अडानी समूह ने जो रफ्तार पकड़ी वह अब भी जारी है? कैसे और किसकी मदद से आज अडानी समूह के पास सात राज्यों में 13 बंदरगाह और देश के कई महत्वपूर्ण एयरपोर्ट संचालन का जिम्मा है. क्यों भाजपा शासित राज्यों तमाम सड़क एवं इंफ्रा के काम इसी समूह को मिल रहे हैं?
जहां भी अडानी समूह हाथ रखता है, वहां हाथ रखने से दूसरी कंपनियां डरती क्यों हैं? ऐसा क्यों होता है कि जहां भी छापेमारी होती है, बाद में उसका अधिग्रहण गौतम अडानी साहब का समूह ही कर लेता है? 2015 में सरकार की मदद से अडानी साहब डिफेंस सेक्टर में भी घुस गये, जहां कुछ भी अनुभव नहीं होते हुए, बहुत सारा काम मिलने लगा. जबकि पहले से इस सेक्टर में काम कर रही कंपनियों को उतना काम और मदद नहीं मिला, क्यों?
ऐसे ही, मोदी सरकार ने एनडीटीवी की जांच शुरू की, प्रमोटरों को परेशान करना शुरू किया, अडानी साहब ने एनडीटीवी में बड़ी हिस्सेदारी खरीद ली. एनडीटीवी के पुराने प्रमोटर पाक साफ घोषित हो गये. ईडी और सीबीआई ने मुंबई एयरपोर्ट की संचालक कंपनी GVK और MIAL के खिलाफ जांच शुरू की, छापेमारी की. उसने अडानी साहब से एयरपोर्ट संचालन में समझौता कर लिया, बाद में अडानी साहब ने उससे बहुसंख्यक हिस्सेदारी ले ली. व्यस्त मुंबई एयरपोर्ट अडानी साहब का हो गया, कैसे?
स्विटरलैंड की कंपनी होल्सिम ग्रुप से अंबुजा एवं एसीसी सीमेंट का अधिग्रहण करके बाद अडानी समूह ने सांघी समूह के अधिग्रहण की योजना बनाई. सांघी समूह को खरीदने की कोशिश में श्री सीमेंट भी था, लेकिन उसके समूह पर आयकर विभाग के छापे पड़ गये. छापे के बाद श्री समूह सांघी सीमेंट्स खरीदने से पीछे हट गया और अडानी समूह के अंबुजा सीमेंट ने बड़ी आसानी से सांघी समूह का अधिग्रहण कर लिया.
ऐसे ही आंध्र प्रदेश का कृष्णपट्टनम पोर्ट पहले नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड के पास था. बंगाल की खाड़ी में बना यह ऑल वेदर पोर्ट गहरे पानी का प्रमुख बंदरगाह है. बड़े कार्गों जहाजों को संभालने वाले देश के कुछ चुनिंदा पोर्ट में शामिल है. इसकी संचालक कंपनी नवयुग पर आयकर ने कार्रवाई की, फिर उसके बाद चमत्कारिक ढंग से इस पोर्ट का अधिग्रहण अडानी समूह ने कर लिया. छापों के बाद अडानी समूह कैसे अधिग्रहण कर लेता था, यह चमत्कारिक घटना है.
इसी तरह क्विंट पर भी छापेमारी होने के बाद अडानी समूह ने इसकी हिस्सेदारी खरीद ली. हालांकि अडानी समूह ने जो सौदे किये, वह नियम कानून के दायरे में रहकर ही किये, लेकिन हर बार सवाल यही उठा कि ईडी और आयकर विभाग की छापेमारी के बाद दूसरे समूह ने क्यों नहीं इन कंपनियों का अधिग्रहण किया या हिस्सेदारी खरीदी? दरअसल, बहुतेरी ऐसी चीजें होती हैं, जो ऊपर से नजर नहीं आतीं, लेकिन सच सबको पता होता है.
तो अडानी साहब यह मत बोलिये कि आपकी साइट पर आते हर आदमी में अपना अक्स दिखता है, उसके पास आप जैसा ना तो हुनर है और ना ही उसके साथ कोई ईडी और इनकम टैक्स है, जिसके छापे के बाद वो उन कंपनियों का अधिग्रहण कर लेगा? अगर ऐसा होता तो आपके अलावा भी देश में कई कंपनियां हैं, जिनके पास बहुत पैसा है, लेकिन छापों के बाद उन्होंने अधिग्रहण नहीं किया, क्यों?
गौतम जी, क्यों भारत की दूसरी कंपनियों की नेटवर्थ उस रफ्तार से नहीं बढ़ी, जिस रफ्तार से आपके समूह का नेटवर्थ बढ़ा? क्या इन कंपनियों को काम करना नही आता था, या फिर इन्हें छापेमारी के बाद परेशान कंपनियों से बातचीत करने नहीं आता था? क्यों नहीं इन कंपनियों को आस्ट्रेलिया, केन्या, इजराइल, तंजानिया, वियतनाम, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि देशों में प्रधानमंत्री के दौरों के तत्काल बाद धंधा नहीं मिलता था, जैसे आपको मिल जाता था?
Share this article