उपचुनाव के नतीजों से कोई ट्रेंड सेट नहीं होता है, लेकिन उपचुनाव का नतीजा यह जरूर बताता है कि वोटर किसी पार्टी के बाप का नौकर नहीं होता है. नतीजा यह भी बताता है कि उसे अहंकार तोड़ना बहुत अच्छे से आता है. आज बिहार, मध्य प्रदेश तथा गुजरात में विस उपचुनाव के नतीजे आये हैं. अगर पार्टी के लिहाज से देखें तो भाजपा केवल बांकीपुर सीट हारी है, बाकी दो जगह वही पार्टी जीती है, जिसका बीते चुनाव में इन सीटों पर कब्जा था, लेकिन नतीजों में बड़ा संदेश छुपा हुआ है.
दरअसल, बांकीपुर चुनाव के नतीजे इसलिये सबसे ज्यादा दिलचस्प हैं कि यह सीट भाजपा के सबसे जवान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की परंपरागत सीट थी. सवर्ण बाहुल्य सीट थी. यह हार केवल नितिन नबीन की हार नहीं है बल्कि यह भाजपा के उस विभाजनकारी राजनीति की भी हार है, जिसकी शुरुआत उसने यूजीसी जैसे कानून लागू करके की थी. सवर्ण बहुल बांकीपुर सीट पर हार भाजपा की उस सोच की हार भी है, कि सवर्ण उसका पिछलग्गू या बंधुआ है. वह कैसे भी हांक लेगी.
बांकीपुर ने संकेत दे दिया है कि भाजपा का कोर वोटर बदली हुई परिस्थिति में अब नये विकल्प की ओर देख रहा है. प्रशांत किशोर की जीत उस रणनीति पर चोट है कि सवर्ण वोटरों के पास विकल्प क्या है? सवर्ण फिलहाल राजद, कांग्रेस या सपा जैसी पार्टी पर अभी भरोसा नहीं कर रहा है, यह चुनाव के रिजल्ट ने स्पष्ट किया है, लेकिन उसने यह भी बता दिया है कि सामने अगर कोई नया और विश्वसनीय विकल्प आता है तो वह भाजपा को छोड़ने में तनिक भी देर नहीं करेगा.
बिहार के विधानसभा चुनाव में जिस प्रशांत किशोर की पार्टी का खाता नहीं खुला था, उस पार्टी ने भाजपा की परंपरागत सवर्ण बाहुल्य सीट पर 20 हजार से जीत हासिल करना बड़ा संदेश है. वह भी तब, जब यह सीट विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की परम्परागत सीट हो. भाजपा के रणनीतिकारों को अहंकार था कि वह जब चाहें, जिसे चाहें, जहां से चाहें उतार देंगे, और वह आसानी से चुनाव जीत जायेगा. बांकीपुर ने बता दिया कि दिल्ली अब दूर है.
भाजपा का फोकस पिछड़ापरस्त राजनीति पर है. जाहिर है, हर दल अपनी मजबूती के लिये कोशिश करता है, लेकिन इसके लिये आवश्यक नहीं है कि अपने कोर वोटर, जो हर मुश्किल परिस्थिति में साथ खड़ा रहा हो, को सिर्फ इसलिये शिकार कर लिया जाये कि उसकी संख्या निर्णायक नहीं है! बिहार ने संदेश दे दिया है कि पर्ची वाली राजनीति और क्लर्क टाइप नेताओं का दौर अब वो लंबा खिंचने के मूड में नहीं है. उसे पढ़ा लिखा नेतृत्व चाहिये और जनता के बीच का भी.
मध्य प्रदेश में दतिया की हार भी भाजपा के उस अहंकार की पराजय है कि वह किसी भी सीट से जिसको चाहेगी उतार देगी, और जिता लेगी. नरोत्तम मिश्रा ने जनता के बीच अपने आंसुओं से बता दिया था कि उन्हें क्या फैसला करना है. इस सीट पर बीते चुनाव में भी कांग्रेस का कब्जा था, लेकिन यहां भाजपा इतनी कमजोर नहीं थी कि हार जाये. भाजपा ने राज्य की राजनीतिक गुणा गणित में नरोत्तम मिश्रा को किनारे लगाने का प्रयास किया, और खुद ही किनारे लग गई.
सवर्ण वोटरों ने अपना संदेश सुना दिया है, अब भाजपा नेतृत्व को तय करना है कि वह किस ओर जाना चाहते हैं. वह बैलेंस की राजनीतिक को प्राथमिकता देंगे, या फिर कालीदास बनकर अपने ही कोर वोटर का जड़ खोदेंगे. अगले पांच-छह महीने में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, भाजपा ने उपचुनाव के नतीजों से सबक नहीं लेती है और अपने अहंकार में डूबी रहती है तो यहां भी नतीजे चौंका वाले आ सकते हैं. क्योंकि जनता ही जनार्दन होती है.
वैसे भी, भाजपा ने यूपी में अपनी पर्ची वाली टीम चुनी है, उसके भरोसे इस बार का चुनाव आसान नहीं होने वाला है. टीम में कई इतने कद्दावर नेता चुने गये हैं, जिनको खुद ही पहचान का संकट है. पंकज चौधरी ने जो अपनी टीम चुनी है, उनमें बहुतेरे तो ऐसे हैं कि जिन्हें पार्टी के चुनावी अभियानों के नाम तक पता नहीं होंगे. दूसरे नौकरशाहीराज और भ्रष्टाचार से ऊबी जनता भी हिंदू-मुसलमान के जाल में कितना फंसती है, यह देखने वाली बात होगी?

