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09.08.2026 · Anil Singh

8 दशक में ही भारत की सत्‍ता से बाहर क्‍यों हो गया वामपंथ?

भारत के किसी भी राज्‍य में वामपंथी सरकार नहीं है. केरलम में विजयन के पराजय के बाद ही वामपंथ का आखिरी किला भी पिछले दिनों ढह गया था. आखिर ऐसा क्‍यों हुआ कि केवल भारत से ही नहीं, जहां जहां भी वामपंथी विचारधारा की सरकारें थीं, वह धीरे-धीरे खत्‍म हो गईं या फिर जनता उनसे दूर हो गई? विश्‍व में कुल 193 देश हैं, लेकिन वेटिकल सिटी और फिलिस्‍तीन को लेकर 195 देश माने जाते हैं. अब इन 195 देशों में केवल क्‍यूबा, उत्‍तर कोरिया, रुस और कुछ हद तक चीन में ही वामपंथी विचारधारा की सरकारें बची हैं. चीन में भी कुछ हद तक कहने का आशय यह है कि आर्थिक-राजनैतिक एवं सामाजिक समानता के नाम पर बनी चीन की सरकार अब पूरी तरह से पूंजीवादी हो चुकी है, जो वास्‍तव में वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों का वास्‍तविक चरित्र है.

सवाल यह है कि भारत से वामपंथ गायब क्‍यों हो गया? क्‍यों आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समानता की बात करने वाले लोगों पर जनता का विश्‍वास बना नहीं रह सका? क्‍यों दुनिया के मजदूरों को एक होने का नारा देने और सामूहिकता की बात करने वालों पर जनता का भरोसा कायम नहीं रह सका? ऐसे बहुतेरे सवाल है, जो वामपंथियों को खुद से पूछने चाहिये, क्‍योंकि व्‍यक्ति या विचार का आकलन दूसरे से बेहतर स्‍वयं ही किया जा सकता है. भारत में वामपंथ की स्‍थापना उसी वर्ष मानी जाती है, जिस वर्ष भारत में राष्‍ट्रीय स्‍वय सेवक संघ की स्‍थापना हुई थी. यानी माना जाता है कि सीपीआई यानी भारत की पहली वामपंथी पार्टी की स्‍थापना 1925 में हुई, लेकिन इनका एक वर्ग मानता है कि सीपीआई की स्‍थापना 1920 में मानवेंद्र नाथ राय ने कई नेताओं के साथ मिलकर ताशकंद में की थी.

बहरहाल, हम वामपंथ की स्‍थापना से इतर इस बात की पड़ताल करने की कोशिश कर रहे हैं कि गरीब, मजदूर, दमित, असहाय, समानता, सामूहिकता की बात करने वाली विचारधारा को उतना बड़ा जनसमर्थन क्‍यों नहीं मिला, जितना आज भारत में ऐसे लोगों की संख्‍या है? क्‍यों आजादी के आठ दशक के भीतर ही वामपंथ को भारतीय जनता ने पूरी तरह नकार दिया? आंकड़ों के लिहाज से मानें तो सात दशक में ही वामपंथ का आखिरी किला भी ढह चुका है, क्‍योंकि कम्‍युनिस्‍ट विचारधारा की पहली सरकार 1957 में ईएमएस नंबूरीपाद के नेतृत्‍व में केरल में बनी थी. उसके बाद बंगाल और त्रिपुरा में भी लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा की सरकारों का ही राज रहा. बीच में जून 1977 के पहले का छोटा से काल खंड को छोड़ दें तो 2026 तक भारत के किसी ना किसी राज्‍य में वामपंथी सरकार सत्‍ता में बनी ही रही.

वामपंथियों ने ब्रिटिशकाल के दौरान मजदूरों के साथ मिलकर ट्रेड यूनियन स्‍थापित किया. उस दौर में अंग्रेजों से प्रताडि़त एवं पीडि़त वर्ग वामपंथी नेताओं की बराबरी और समानता की बातों से प्रभावित होकर तेजी से इनके साथ जुड़ा. इसका यह असर हुआ कि इनके आंदोलनों को व्‍यापक जनसमर्थन मिला. लंबे समय तक जनता ने इनकी नीयत पर शक नहीं किया, और अपना समर्थन जारी रखा. पर, वामपंथ के पास समस्‍या पहचानने की शक्ति तो थी, लेकिन उसके समाधान की क्षमता इनके पास नहीं थी. भारतीय वामपंथ अपने पूरे राजनीतिक करियर में समस्‍याओं को तो उठाता रहा, लेकिन उसका कोई व्‍यवहारिक समाधान कभी प्रस्‍तुत ही नहीं कर सका. सत्‍ता में होने के बाद भी वामपंथ ने ऐसा कोई समाधान नहीं दिया, जिससे आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक समानता आये.

पश्चिम बंगाल इनके विचारधारा की असफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है. 34 सालों तक बंगाल में वामपंथ का शासन रहा इसके बावजूद बंगाल में ना तो कहीं आर्थिक समानता आ पाई, और ना ही कहीं राजनीतिक एवं सामाजिक समानता दिखी. अलबत्‍ता यह जरूर हुआ कि अंग्रेजों के दौर में समुद्र किनारे होने के नाते औद्योगिक राज्‍य के रूप में स्‍थापित पश्चिम बंगाल को ट्रेड यूनियन की आड़ में बरबाद कर दिया. वामपंथी ट्रेड यूनियनों की हड़ताल से आजिज आकर कोलकाता एवं आसपास के जूट मिल एवं उद्योगपति अपने उद्योग लेकर ढाका या आसपास के दूसरे राज्‍यों में चले गये. टाटा, बिड़ला, डालमिया जैसे ग्रुप की कंपनियां या तो बंद होकर बरबाद हो गईं या फिर दूसरे राज्‍यों में चली गईं. हां, इस बीच यह जरूर हुआ कि आर्थिक समानता की बात करने वाले कई नेता आर्थिक तौर पर मजबूत हो गये.

इनके बंगाल की सत्‍ता में आने से पहले एक बात और हुई कि सीपीआई से अलग होकर 1964 सीपीएम की स्‍थापना की गई. 1967 में इसी सीपीएम से निकलकर चारू मजूमदार, कानू सान्‍याल, जंगल संथाल ने सशस्‍त्र आंदोलन की शुरुआत की. धीरे धीरे इस आंदोलन के भारत के एक बड़े भूभाग पर आतंक का परचम फहरा दिया. नक्‍सल प्रभावित जिले का निवासी होने के नाते मुझे इस नक्‍सलवाद को बहुत नजदीक से देखने, समझने और महसूस करने का अवसर मिला. इसी दौरान मुझे वामपंथ का घिनौना चेहरा भी देखने को मिला. दरअसल, जंगल में आदिवासी एवं आम लोगों के जीवन को समझने के लिये मैं अक्‍सर नौगढ़ के गांवों का चक्‍कर मारता रहता था, और पेयजल-स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं की समस्‍या, गरीबी-भुखमरी, वन विभाग और पुलिस द्वारा प्रताडि़त किये जाने की घटनाओं को नजदीक से महसूस करता. तब नक्‍सलियों का स्‍टैंड सही लगता.

निश्चित रूप से आदिवासियों और ग्रामीणों को कई किमी दूर से पीने का पानी ढोकर लाते देखना, बीमारों को कंधों या चारपाई पर लादकर इलाज के लिये ले जाते देखना कतई सुखद नहीं था. भोजन का अभाव, रोजगार की कमी, लकड़ी काटने के नाम पर वन विभाग से प्रताड़ना, नक्‍सलियों को आश्रय देने के नाम पर पुलिस की प्रताड़ना से दुखी परिवारों को देखता तो कोफ्त होती, लेकिन कालांतर यह भी देखने को मिलने लगा कि ये आदिवासी दो पाटों के बीच पीस रहे हैं. खुद को ये लोग मझधार में फंसा बैठे हैं. आदिवासियों, वनवासियों को ना तो आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक समानता मिल पा रही थी और ना ही शासन की तरफ से किसी प्रकार की सुविधा. उलटे वो दोनों तरफ से प्रताडि़त और परेशान हो रहे थे. यह विकट परिस्थिति थी, जिसे मैंने बहुत नजदीक से महसूस किया.

दरअसल, नक्‍सलियों के डर से शासन जंगल में किसी भी प्रकार का विकास कार्य धरातल पर चलाने से डरता था. कोई भी कर्मचारी, अधिकारी या ठेकेदार नक्‍सल प्रभावित इलाकों में काम कराने से घबराता था. नक्‍सलियों को लेवी देने के बावजूद गारंटी नहीं थी कि वह कोई कार्य पूरा होने देंगे. नक्‍सलियों को सड़क बनने से सबसे ज्‍यादा दुश्‍मनी थी. वह जंगल के बीच पड़ने वाले गांवों तक सड़क नहीं बनने देना चाहते थे, क्‍योंकि उन्‍हें डर होता था कि इससे सुरक्षा बलों के आवागमन में तेजी आयेगी, उनके लिये मुश्किल पैदा होगी. सड़क सुविधा पहुंचने की पहला कदम होता है, लेकिन वो ऐसे विकास कार्यों में अड़ंगा लगाने को जंगल के हित में बताते, जो पहली नजर में उन्‍हें जनहितैषी और वनहितैषी साबित करता, लेकिन नुकसान ग्रामीणों का होता था. सड़क के अभाव में उनकी मुश्किलें आसान नहीं होती थीं.

दूसरी तरफ, अधिकारी इस स्थिति से खुश होते थे. वह कागजों पर विकास कर रहे थे, लेकिन धरातल पर कहीं कुछ नहीं होता. अधिकारियों को अपने इस धत्‍तकर्म का कोई डर भी नहीं था, क्‍योंकि नक्‍सल इलाके में स्‍थलीय जांच करने जाने की हिम्‍मत किसी भी बड़े अधिकारी या नेता में नहीं होती थी. इसी तरह की स्थिति उत्‍तर प्रदेश के तीनों नक्‍सल प्रभावित जिले चंदौली, मिर्जापुर और सोनभद्र में थी. शुरुआत में तो वनवासियों और आदिवासियों ने नक्‍सलियों की मदद की. कालांतर जब पीढि़यां बदलीं, नक्‍सली सोच में भी बदलाव आ गया. पहले नक्‍सली एक या दो की संख्‍या में किसी घर में रूकते खाते पीते, आगे बढ़ जाते. बाद में वे जिस झोपड़ी में रुकते, उसके यहां पलने वाले मुर्गी, मुर्गा बकरा ज‍बरिया कटवाने लगे. तीसरे चरण वे जिस घर में रुकते, उस घर की बेटियों-महिलाओं पर भी बुरी नजर डालने लगे.

खैर, नक्‍सल आंदोलन के भटकाव को यहीं रोक कर असली सवाल पर आते हैं कि भारत में वामपंथ विचारधारा सिमट क्‍यों गई? वामपंथ के सिमटने का जो सबसे बड़ा कारण है कि विदेश से आयातित यह विचारधारा कभी भारतीय जनमानस को उनके आत्‍मा के लिहाज से कभी समझ ही नहीं पायी और उसके हिसाब से कभी व्‍यवहार नहीं कर पायी. भारत में चीन या रुस जैसा एकरूपता नहीं है बल्कि भारत बहुरंगी-बहुधार्मिक एवं सामाजिक रूप से कई जातियों में बंटे समूह का देश है, जिसमें एक ही तरह के नियम हर जगह लागू नहीं किये जा सकते हैं. परंतु वामपंथ के बड़े बड़े चिंतक इस बात को समझने की बजाय विदेशी मार्क्‍स और लेलिन की विचारधारा को भारत में लागू करने के लिये हर संभव प्रयास करते रहे. इस प्रयास में अगर भारत के टुकड़े भी होते हों तो वामपंथ विचारधारा को इससे परहेज नहीं था.

वामपंथ से जुड़े सीपीआई, सीपीएम, ऑल इंडिया किसान सभा, आइसा, इप्‍टा, प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन जैसे संगठनों को भारत के टुकड़े टुकड़े देखने से कोई परहेज नहीं है. भारत में तरह तरह के लोग हैं, लेकिन उनमें से बड़ी आबादी कभी भी भारत के टुकड़े टुकड़े होते नहीं देखना चाहती है, उसमें हिंदू भी हैं, मुसलमान भी हैं, सिख भी हैं और इसाई भी हैं, बौद्ध भी हैं, जैन भी हैं, लेकिन वामपंथ की मंशा केवल और केवल बुतों को तोड़कर अल्‍ला का नाम रहने देने का है. और सच्‍चाई ये है कि ये अल्‍ला के भी नहीं हैं, बस इन्‍हें भारत को तोड़ने के लिये अल्‍ला की तात्‍कालिक दरकार है. ये सिर्फ अपनी जरूरतों के हिसाब से नारे गढ़ते हैं और सुविधानुसार आंदोलन करते हैं. एक वामपंथी हिंदू नास्तिक होता है, वह भगवान के अस्तित्‍व को स्‍वीकार नहीं करता, पूजा नहीं करता, लेकिन मुस्लिम वामपंथी नास्तिक होते हुए भी नमाज पढ़ता है. यही इनका चरित्र है.

दरअसल, वापपंथ का चरित्र ही दोहरा है. उदाहरण के तौर पर देखिये कि पूंजीवाद का विरोध करके आर्थिक समानता की बात करने वाले इस विचारधारा के हजारों लोग, जो अस्‍सी सालों में करोड़पति-अरबपति हो चुके हैं, को आप देखेंगे तो वह मौखिक और लिखित रूप से आर्थिक विषमता पर सवाल उठाते नजर आयेंगे, सुंदर सुंदर व्‍याख्‍यान देते नजर आयेंगे, इनको सुनकर लगेगा कि कितने महान लोग हैं, लेकिन वह अपने स्‍वयं के अतिरिक्‍त संसाधनों का बंटवारा किसी गरीब-मजलूम के साथ करते कभी दिखायी नहीं देंगे. बस यही दोगलापन इस वि‍चारधारा और इस विचारधारा के पोषक लोगों को भारत में पनपने नहीं दिया. आप अतीत में जायें तो कश्‍मीरी पंडित नरसंहार और गुजरात नरसंहार पर इनके विचार अलग अलग नजर आयेंगे. एक ही तरह की घटना पर इनके स्‍टैंड अलग अलग होते हैं. सुविधा की यह राजनीति ही इनके समाप्ति का कारण है.

इनके दोहरे रवैये का एक छोटा सा उदाहरण. दिल्‍ली में जब सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान युवाओं ने नरेंद्र मोदी को गाली दिया तब ये लोग उनके बचाव में तरह तरह के विचार गढ़े. गालियों की नई नई व्‍याख्‍यायें कीं, इसे आंदोलन में नई पीढ़ी का नवाचार बताया. आंदोलन में अभिव्‍यक्ति का तरीका बताया, लेकिन जब उसी उम्र का एक युवा इनके छात्र संगठन आइसा की नेहा बोरा पर अहिंसक रूप से केवल स्‍याही फेंक दिया तो वह विकृत मानसिकता का हो गया. वह दक्षिणपंथी हो गया. अगर आइसा के किसी सदस्‍य ने किसी दूसरे विचारधारा या कहें कि दक्षिणपंथी विचारधारा के युवा के ऊपर स्‍याही फेंक दिया होता तो ये अलग स्‍टैंड लेकर उसका गुणगान करते नजर आते. दरअसल, यही दोगलापन है, जिसे भारत पसंद नहीं करता है. आज वामपंथ भारत में खत्‍म होने के कगार पर पहुंचाने में इन लोगों का यही चरित्र सबसे ज्‍यादा जिम्‍मेदार है.

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी वामपंथी एक तरह के ही चरित्र के होते हैं. कुछ निश्चित तौर अच्‍छे लोग भी हैं, जो व्‍यवहार एवं वास्तिविकता में एक जैसा जीवन जी रहे हैं, लेकिन उनकी संख्‍या सीमित है. जैसे किसी धर्म में, किसी पार्टी में, किसी समाज में, किसी परिवार में ना तो सब लोग अच्‍छे हो सकते हैं और ना ही सब लोग बुरे हो सकते हैं, उसी तरह वामपंथ के विचारधारा में भी ऐसा ही है, लेकिन यहां अच्‍छे लोगों की संख्‍या सीमित है. यहां पर भी एक ही तरह की घटनाओं पर एक तरह का स्‍टैंड लेने वालों की संख्‍या नगण्‍य है. इसका परिणाम है कि ये पश्चिम बंगाल की सत्‍ता से बाहर हुये, त्रिपुरा की सत्‍ता से बाहर हुए, केरलम की सत्‍ता से भी बाहर हो गये. ये अपने चरित्र के दोहरेपन को दरकिनार कर भारत के जनमानस के लिहाज से खुद को परिमार्जित नहीं करेंगे तो यह दो चार सीटों तक भी नहीं बचेंगे.

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