मैं आंदोलन की शुरुआत में युवाओं के पेपर लीक के जेन्युइन मुद्दे को लेकर लिखना चाहता था, लेकिन धैर्य रखकर इंतजार किया. फिर इसमें डफली वाले, ढोलकी वालों की इंट्री हो गई तो फिर लगा कि अब इस आंदोलन की मइया दइया हो जानी है. मत ही लिखो, क्योंकि ये जहां रहेंगे उस जगह, सिस्टम, आंदोलन को बरबाद कर देंगे. इसी बीच, युवाओं-छात्रों ने सांसद की तरफ कूच किया. पुलिस लाठीचार्ज हो गया, डफली और जुम्मा वाले भाग निकले, बच्चे पीट दिये गये. फिर मन किया कि सरकार में लोकतंत्र को कुचला जा रहा है तो इस बारे में लिख डालो, लेकिन सोचा थोड़ा और माहौल देख लिया जाये. तब कुछ लिखा पढ़ा जाये. वैसे भी, लिखने या ना लिखने से क्या ही फर्क पड़ जाने वाला है.
जब इस आंदोलन में अभद्र भाषा और अभद्र बैनरों की बाढ़ आने लगी तो लगा कि इन लोगों को सही पीटा गया है, क्योंकि किसी भी आंदोलन में भाषायी अनुशासन का होना बेहद जरूरी है. और शब्दों की मर्यादा भी. मुझे उन बच्चों के अभिभावकों पर भी शर्म आई, जिन्होंने अपने बच्चों को इस तरह शिक्षित किया है कि वह सार्वजनिक रूप से ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, जो कम से कम हम जेन X, मिलेनियल्स वाले अपने दोस्तों के अलावा सार्वजनिक तौर पर कहीं नहीं बोल सकते हैं. संभव है कि जेन G अपने घरों पर भी इसी तरह गाली ग्लौज वाली अभद्र भाषा में अपने एडवांस मां बाप से बात करते हों. तभी उन्हें सार्वजनिक रूप से यह करते हुए अपने गार्जियन का कोई डर नहीं था.
निश्चित रूप से परीक्षाओं का पेपर लीक हो जाना सरकार और सिस्टम की असफलता है. एक बार पेपर का लीक होना इत्तेफाक हो सकता है, लेकिन हर बार यही प्रक्रिया दोहराई जाने लगे तो फिर संदेह होना जायज है. धर्मेंद्र प्रधान को हटाये जाने की मांग वैसे भी जायज थी, क्योंकि एक बार गलती तो माफ की जा सकती है, लेकिन गलती करना ही आदत बन जाये तो फिर हटाये जाने की मांग ही सबसे उचित है. धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में युवाओं के भविष्य के साथ कई बार खिलवाड़ हो चुका है. केंद्र के कुछ सर्वाधिक विवादित मंत्रियों में प्रधान अव्वल हैं. वैसे, प्रधान में तनिक भी नैतिकता होती तो इस्तीफा दे दिये होते, लेकिन अब राजनीति में नैतिकता की बात करना ही बेमानी हो चुका है.
बहरहाल, मुझे बिहार के युवाओं का आंदोलन दिल्ली वालों के आंदोलन से ज्यादा बेहतर लगा. उन्होंने ना तो कहीं सार्वजनिक सम्पत्ति को कोई नुकसान पहुंचाया और ना ही इस तरह की अभद्र भाषा का बैनर पोस्टर लहराया, जो उनके घर वालों को खराब लगता हो. उन्होंने अपने प्रोटेस्ट के दौरान उतना ही आनंद उठाया, जितना वास्तविक छात्र उठाते हैं. इसके विपरीत दिल्ली का माहौल देश के भावी भविष्य के लिहाज से भी डरावना लगा, क्योंकि शिक्षा का स्तर इस कदर गिरा हुआ दिखा कि बच्चे जिस नीट पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन करने आये थे, बहुतेरों को उसके बारे में ही कोई जानकारी नहीं थी. वह बस भीड़ का हिस्सा बनने या फिर अपने एजेंडा के साथ जंतर मंतर पहुंच गये थे.
आंदोलन के दौरान मीडियाकर्मियों पर हुये हमले भी भयावह रहे. अब तो जवाबदेही किसी सिस्टम का हिस्सा नहीं रह गया है. जवाबदेही तय करने जैसी तमाम नैतिक व्यवस्थायें ही पतित हो चुकी हैं तो फिर किसी भी पक्ष से जवाबदेही की उम्मीद करना मूर्खता के अलावा कुछ और नहीं है, लेकिन इस आंदोलन के बीच मीडियाकर्मियों एवं जर्नलिस्टों पर जिस तरह से जानलेवा हमले हुये निश्चित रूप से वह बेहद चिंताजनक है. पत्रकारिता के लिहाज से आगे आने वाला समय भी बहुत भयावह और कठिन होता दिख रहा है. खासकर टीवी मीडिया और सोशल मीडिया के पत्रकारों के लिये यह संकेत बेहद ही डरावना और भयभीत करने वाला है. यह परिपाटी बेहद खतरनाक है.
जिन लोगों ने भी गोदी मीडिया के नाम पत्रकारों पर हुये हमले को जायज ठहराया या मजा लिये, वो भूल रहे हैं कि जब कभी दूसरे पक्ष का आंदोलन होगा तो आज मजा लेने वाले कांगी-वामी मीडिया के पत्रकार एवं अन्य तमाम लोग भी इसी तरह भीड़ का शिकार बनेंगे, क्योंकि किसी बस्ती में लगी आग सबको चपेट में लेती है. भेदभाव नहीं करती है. दरअसल, अब मीडिया किसी की जरूरत नहीं रह गया है. सत्ताधारी पार्टियां और सरकारों ने तो पहले ही मीडिया से लगभग किनारा कर लिया है. विपक्ष को भी बहुत जरूरत नहीं है. अब पत्रकारों या उनके संस्थानों की बहुत जरूरत भी नहीं रह गई है. उन्होंने वोटरों तक पहुंचने के लिये अपने तंत्र विकसित कर लिये हैं, उन्हें मीडिया माध्यमों की आवश्यकता नहीं रह गई है.
दरअसल, गलत-सही सूचनाओं के प्रसारण के लिये सभी पार्टियों के अपने मीडिया सेल, आईटी सेल हैं. बाकी प्रचार प्रसार करने के लिये फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, थ्रेड्स, लिंकडिन, यूट्यूब जैसे तमाम सोशल साइट्स और माध्यम हैं, जो उनकी बात वोटरों तक आसानी से पहुंचा सकते हैं. सत्ताधारी दल तो अब बस एक दो एजेंसियों को ही सूचनायें देकर अपना उल्लू सीधा कर लेता है, उसे ना तो किसी पत्रकार की जरूरत है, और ना ही किसी पत्रकारिता संस्थान की. विपक्ष भी कुछ चैनलों-संस्थानों की कारस्तानी के आधार पर अब पक्ष की बात नहीं करने वाले सभी लोगों को गोदी मीडिया बताकर मजाक उड़ाता रहता है. ऐसे में जरूरत है कि मीडिया अपने असली स्वरूप में आये, और सत्ता से सवाल करे साथ ही विपक्ष की जवाबदेही पर भी प्रश्न उठाये.
वरना, सत्ताधारी पार्टियों द्वारा आंदोलन तो कुचले ही जायेंगे, मीडिया को भी बख्शा नहीं जायेगा, जिसकी शुरुआत इस आंदोलन से हो चुकी है. बहरहाल, मैं इस आंदोलन में किसी के भी पक्ष में नहीं हूं. हां, यह जरूरी है कि पेपर लीक से रोकने के लिये तकनीक विकसित की जाये. छात्रों के लिये एक बेहतर शिक्षा तंत्र डेवलप किया जाये, ताकि हम शिक्षा के नाम पर केवल साक्षर ना पैदा करें बल्कि ऐसे नागरिक पैदा करें जो देश के बेहतरी के मोर्चे पर भी अव्वल एवं उत्कृष्ट बनें. रिसर्च करें, नई खोज करें, क्योंकि आने वाला समय केवल मानवीय चुनौतियों का नहीं बल्कि एआई से मुकाबले का भी है. तकनीक जिस तेजी से बदल रही है, उस हिसाब से शिक्षा नहीं मिली तो बच्चे ही नहीं, देश भी पीछे रह जायेगा.
तिरछी कटारी सत्य है इसलिए कड़वा है